हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 1)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
नम॑स्ते अस्तु वि॒द्युते॒ नम॑स्ते स्तनयि॒त्नवे॑ । नम॑स्ते अ॒स्त्वश्म॑ने॒ येना॑ दू॒डाशे॒ अस्य॑सि ॥ (१)
हे पर्जन्य! विद्युत को मेरा नमस्कार हो. गर्जन करते हुए वज्र को मेरा नमस्कार हो. आप आततायियों को दूर फेंक देते हैं. (१)
O Parjanya! My greetings to Vidyut. Greeting me to the thunderbolt thunderbolt. You throw away the terrorists. (1)

अथर्ववेद (कांड 1)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
नम॑स्ते प्रवतो नपा॒द्यत॒स्तपः॑ स॒मूह॑सि । मृ॒डया॑ नस्त॒नूभ्यो॒ मय॑स्तो॒केभ्य॑स्कृधि ॥ (२)
हे पर्जन्य! आप सत्पुरुषों की रक्षा करते हैं. आप को नमस्कार है. आप जल को भीतर धारण किए रहते हैं और समय से पहले नीचे नहीं गिरने देते हैं. आप पाप विनाशक तप को एकत्र करते हैं एवं पापियों पर अपना वज्र फेंकते हैं. आप हमारे शरीर को सुख दें और हमारे पुत्र, पौत्र आदि का कल्याण करें. (२)
O Parjanya! You protect the satpurushas. Hello to you. You hold the water inside and do not allow it to fall down prematurely. You collect sin-destroying tenacity and throw your thunderbolt at sinners. May you give happiness to our body and benefit our sons, grandsons etc. (2)

अथर्ववेद (कांड 1)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
प्रव॑तो नपा॒न्नम॑ ए॒वास्तु॒ तुभ्यं॒ नम॑स्ते हे॒तये॒ तपु॑षे च कृण्मः । वि॒द्म ते॒ धाम॑ पर॒मं गुहा॒ यत्स॑मु॒द्रे अ॒न्तर्निहि॑तासि॒ नाभिः॑ ॥ (३)
हे ऊंचाई से नीचे की ओर गिरने वाले पर्जन्य! तुम्हारे लिए नमस्कार है. तुम्हारे संतापकारी आयुध वज्र को नमस्कार है. हम आप के गुफा के समान अगम्य एवं उत्तम निवास स्थान को जानते हैं. जिस प्रकार शरीर में नाभि मध्यस्थ है, उसी प्रकार तुम अंतरिक्ष के केंद्र सागर में स्थित हो. (३)
O rain falling from height to bottom! Hello to you. Salutations to your angry weapon vajra. We know the inaccessible and exquisite habitat of your cave. Just as the navel is the intermediary in the body, so you are located in the ocean, the center of space. (3)

अथर्ववेद (कांड 1)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
यां त्वा॑ दे॒वा असृ॑जन्त॒ विश्व॒ इषुं॑ कृण्वा॒ना अस॑नाय धृ॒ष्णुम् । सा नो॑ मृड वि॒दथे॑ गृणा॒ना तस्यै॑ ते॒ नमो॑ अस्तु देवि ॥ (४)
हे अग्नि! सभी देवों के अप्रिय पुरुषों पर गिराने के लिए एवं शत्रुओं पर बाण के रूप में फेंकने के लिए तुम्हारी रचना की गई है. यज्ञ में तुम्हारी स्तुति भी की जाती है. तुम हमारी रक्षा करो. हे आकाश में चमकती हुई अग्नि! तुम्हारे लिए नमस्कार हो. (४)
O agni! You have been created to throw at the unpleasant men of all gods and to throw them as arrows at the enemies. You are also praised in the yajna. You protect us. O agni shining in the sky! Hello to you. (4)