हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यां क॒ल्पय॑न्ति वह॒तौ व॒धूमि॑व वि॒श्वरू॑पां॒ हस्त॑कृतां चिकि॒त्सवः॑ । सारादे॒त्वप॑ नुदाम एनाम् ॥ (१)
कृत्या को बनाने वाले उसे उपहार के साथ प्राप्त होने वाली वधू के समान सजाते हैं. हम उसी कृत्या को भगाते हैं. वह कृत्या हम से दूर चली जाए. (१)
The makers of krita decorate her like a bride who receives it with gifts. We drive away the same act. Let that act go away from us. (1)

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
शी॑र्ष॒ण्वती॑ न॒स्वती॑ क॒र्णिनी॑ कृत्या॒कृता॒ संभृ॑ता वि॒श्वरू॑पा । सारादे॒त्वप॑ नुदाम एनाम् ॥ (२)
सिर, नाक, कान आदि अंगों से युक्त बनाई गई कृत्या अनेक प्रकार की आपत्तियां लाती है. उसे हम भगाते हैं. वह हमारे पास से दूर चली जाए. (२)
An act made with organs like head, nose, ears etc. brings many types of objections. We drive him away. Let him go away from us. (2)

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
शू॒द्रकृ॑ता॒ राज॑कृता॒ स्त्रीकृ॑ता ब्र॒ह्मभिः॑ कृ॒ता । जा॒या पत्या॑ नु॒त्तेव॑ क॒र्तारं॒ बन्ध्वृ॑च्छतु ॥ (३)
शूद्र के द्वारा निर्मित, राजा के द्वारा निर्मित, स्त्री के द्वारा निर्मित एवं मंत्रों के द्वारा प्रेरित कृत्या अपने बनाने वाले के समीप उसी प्रकार लौट जाए, जिस प्रकार भाइयों के द्वारा विदा की गई पत्नी अपने पति के समीप लौट जाती है. (३)
The act made by the Shudra, made by the king, made by the woman and inspired by mantras should return to her creator in the same way as the wife sent off by the brothers returns to her husband. (3)

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
अ॒नया॒हमोष॑ध्या॒ सर्वाः॑ कृ॒त्या अ॑दूदुषम् । यां क्षेत्रे॑ च॒क्रुर्यां गोषु॒ यां वा॑ ते॒ पुरु॑षेषु ॥ (४)
मैं इस जड़ीबूटी के द्वारा समस्त कृत्याओं को क्षेत्र में गायों पर एवं पुरुषों पर की गई कृत्या को शक्तिहीन कर चुका हूं. (४)
I have made all the acts done by this herb on cows and men in the area powerless. (4)

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
अ॒घम॑स्त्वघ॒कृते॑ श॒पथः॑ शपथीय॒ते । प्र॒त्यक्प्र॑ति॒प्रहि॑ण्मो॒ यथा॑ कृत्या॒कृतं॒ हन॑त् ॥ (५)
पाप उसे प्राप्त हो, जिस ने पाप किया है. शपथ उसी के पास जाए, जिस ने शपथ की है. मैं कृत्या को इस प्रकार वापस लौटाता हूं कि वह अपने निर्माता का ही विनाश कर दे. (५)
Sin be received by him who has sinned. The oath should go to the one who has taken the oath. I return Krita in such a way that he destroys his creator. (5)

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
प्र॑ती॒चीन॑ आङ्गिर॒सोऽध्य॑क्षो नः पु॒रोहि॑तः । प्र॒तीचीः॑ कृ॒त्या आ॒कृत्या॒मून्कृ॑त्या॒कृतो॑ जहि ॥ (६)
हमारा पुरोहित पश्चिम देश का रहने वाला एवं हमारे सामने उपस्थित है. पूर्व के निवासियों ने कृत्या का निर्माण किया है. हे पुरोहित! तुम उस को नष्ट करो. (६)
Our priest hails from the West and is present before us. Residents of the east have built krita. O priest! You destroy that. (6)

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यस्त्वो॒वाच॒ परे॒हीति॑ प्रति॒कूल॑मुदा॒य्यम् । तं कृ॑त्येऽभि॒निव॑र्तस्व॒ मास्मानि॑च्छो अना॒गसः॑ ॥ (७)
हे कृत्या! जिस ने तुझे आदेश दिया कि दूर जा. उस ने हमारे प्रतिकूल आचरण किया है. तू उसी के पास लौट जा तथा हम निरपराधों की इच्छा मत कर. (७)
O act! Who ordered you to go away. He has behaved against us. Go back to Him and do not desire us innocent. (7)

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यस्ते॒ परूं॑षि संद॒धौ रथ॑स्येव॒र्भुर्धि॒या । तं ग॑च्छ॒ तत्र॒ तेऽय॑न॒मज्ञा॑तस्ते॒ऽयं जनः॑ ॥ (८)
हे कृत्या! बढ़ई जिस प्रकार रथ के अंगों को जोड़ता है, उसी प्रकार जिस ने बुद्धिमत्ता के साथ तेरी हड्डियों को जोड़ा है, तू उसी के समीप लौट जा. तेरा गंतव्य वही है. मैं तेरा अपरिचित हूं. (८)
O act! Just as the carpenter connects the parts of the chariot, so you return to him who has connected your bones with wisdom. Your destination is the same. I am unfamiliar with you. (8)
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