हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.5.11

कांड 10 → सूक्त 5 → मंत्र 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
मि॒त्रावरु॑णयोर्भा॒ग स्थ॑ । अ॒पां शु॒क्रमा॑पो देवी॒र्वर्चो॑ अ॒स्मासु॑ धत्त । प्र॒जाप॑तेर्वो॒ धाम्ना॒स्मै लो॒काय॑ सादये ॥ (११)
हे जलो! तुम मित्र और वरुण के भाग हो. तुम जलों का वीर्य और दिव्य तेज हमें में धारण करो. तुम लोक के कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित करो. (११)
O burn! You are friends and part of Varun. You bear the semen of the waters and the divine glory in us. You should establish the glory of Prajapati in us for the welfare of the people. (11)