अथर्ववेद (कांड 10)
विष्णोः॒ क्रमो॑ऽसि सपत्न॒हान्तरि॑क्षसंशितो वा॒युते॑जाः । अ॒न्तरि॑क्ष॒मनु॒ वि क्र॑मे॒ऽहं अ॒न्तरि॑क्षा॒त्तं निर्भ॑जामो॒ यो॒स्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः । स मा जी॑वी॒त्तं प्रा॒णो ज॑हातु ॥ (२६)
तू विश्व का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू अंतरिक्ष पर आश्रित एवं विश्व का तेज है. मैं अंतरिक्ष में पराक्रम दिखाता हूं एवं उसे अंतरिक्ष से दूर भगाता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उस का त्याग कर दें. (२६)
You are the destroyer of the world's might and enemies. You are dependent on space and the fastest of the world. I show might in space and drive him away from space. The one who hates us or the one we hate should not survive. Give up life from him. (26)