अथर्ववेद (कांड 11)
अग्ने॒ जाय॒स्वादि॑तिर्नाथि॒तेयं ब्र॑ह्मौद॒नं प॑चति पु॒त्रका॑मा । स॑प्तऋ॒षयो॑ भूत॒कृत॒स्ते त्वा॑ मन्थन्तु प्र॒जया॑ स॒हेह॑ ॥ (१)
हे अग्नि देव! तुम अरणि मंथन से उत्पन्न हुए हो. यह देव माता अदिति पुत्र की कामना से इस ब्रह्मौदनासव नामक कर्म में ब्राह्मणों को खिलाने के हेतु भात पकाना चाहती है. मरीच आदि सप्त ऋषि पृथ्वी आदि को बनाने वाले हैं. वे इस देवयज्ञ में मंथन के द्वारा तुम्हें यजमान के पुत्र, पौत्र आदि के साथ उत्पन्न करें. (१)
O God of Agni! You have originated from Arani Manthan. This God mata Aditi wants to cook rice to feed Brahmins in this karma called Brahmaudanasav with the wish of son. Marich etc. sapta rishis are going to make the earth etc. May they produce you with the host's son, grandson etc. through churning in this devyagya. (1)
अथर्ववेद (कांड 11)
कृ॑णु॒त धू॒मं वृ॑षणः सखा॒योऽद्रो॑घाविता॒ वाच॒मच्छ॑ । अ॒यम॒ग्निः पृ॑तना॒षाट् सु॒वीरो॒ येन॑ दे॒वा अस॑हन्त॒ दस्यू॑न् ॥ (२)
हे कामना पूर्ण करने वाले एवं जगत् के मित्र सप्त ऋषियो! तुम अरणि मंथन के द्वारा धुआं उत्पन्न करो. ये अग्नि देव स्तुति रूपी ऋचाएं सुन कर उत्तम चरित्र वाले यजमानों की शत्रुओं से रक्षा करते हैं. देवों सहित ये अग्नि देवशत्रु सेनाओं को पराजित करते हैं. अग्नि की सहायता से देवों ने राक्षसों को पराजित किया था. (२)
O seven sages who fulfill the wish and friends of the world! You generate smoke through arani churning. These agni gods listen to the verses of praise and protect the hosts with good character from enemies. These agnis, including the Devas, defeat the Devashatru armies. With the help of agni, the devas defeated the demons. (2)
अथर्ववेद (कांड 11)
अग्नेऽज॑निष्ठा मह॒ते वी॒र्याय ब्रह्मौद॒नाय॒ पक्त॑वे जातवेदः । स॑प्तऋ॒षयो॑ भूत॒कृत॒स्ते त्वा॑जीजनन्न॒स्यै र॒यिं सर्व॑वीरं॒ नि य॑च्छ ॥ (३)
हे उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता अग्नि देव! तुम परम सामर्थ्य के लिए अरणि मंथन से उत्पन्न होते हो. पृथ्वी आदि की रचना करने वाले सप्त ऋषियों ने तुम्हें ब्रह्मौदन पकाने के लिए उत्पन्न किया था. तुम इस पत्नी को पुत्र, पौत्र आदि वीरों से युक्त धन प्रदान करो. (३)
O God of agni, the knower of beings born! You are born from the churning of the forest for the ultimate power. The Sapta rishis who created the earth etc. created you to cook Brahmaudan. You give this wife wealth with sons, grandsons etc. heroes. (3)
अथर्ववेद (कांड 11)
समि॑द्धो अग्ने स॒मिधा॒ समि॑ध्यस्व वि॒द्वान्दे॒वान्य॒ज्ञियाँ॒ एह व॑क्षः । तेभ्यो॑ ह॒विः श्र॒पयं॑ जातवेद उत्त॒मं नाक॒मधि॑ रोहये॒मम् ॥ (४)
हे प्रज्वलित अग्नि! तुम समिधाओं के द्वारा अधिक दीप्त बनो एवं यज्ञ के योग्य देवों को जानते हुए उन्हें यहां लाओ. हे जातवेद अग्नि! उन देवों के निमित्त ब्रह्मौदन रूपी हवि पकाते हुए तुम इस यजमान को उत्तम स्वर्गलोक में पहुंचाओ. (४)
O blazing agni! You become more luminous through the samidhas and bring them here knowing the gods worthy of yajna. O jataved agni! For those gods, while cooking the havi of Brahmaodan, you take this host to the best heavenland. (4)
अथर्ववेद (कांड 11)
त्रे॒धा भा॒गो निहि॑तो॒ यः पु॒रा वो॑ दे॒वानां॑ पितॄ॒णां मर्त्या॑नाम् । अंशा॑ञ्जानीध्वं॒ वि भ॑जामि॒ तान्वो॒ यो दे॒वानां॒ स इ॒मां पा॑रयाति ॥ (५)
तुम्हारे लिए अर्थात् अग्नि आदि देवों के लिए, पितरों के लिए और मनुष्यों के लिए पहले जो भाग तीन से विभाजित किए गए हैं, हे देव! पितर एवं मनुष्य! उन भागों को जानो. मैं तुम्हारे लिए उन भागों को अलगअलग करता हूं. उन में देवों का जो भाग है, वह अग्नि में हि के रूप में हवन किया जा रहा है. वह देव भाग इस यजमान पत्नी को इष्ट फल प्रदान करे. (५)
For you, that is, for the gods of agni, for the ancestors and for the human beings, the parts which have been divided by three, O God! Father and man! Know those parts. I separate those parts for you. The part of the gods in them is being performed in the form of a havan in the agni. May that god part give favored results to this host wife. (5)
अथर्ववेद (कांड 11)
अग्ने॒ सह॑स्वानभि॒भूर॒भीद॑सि॒ नीचो॒ न्युब्ज द्विष॒तः स॒पत्ना॑न् । इ॒यं मात्रा॑ मी॒यमा॑ना मि॒ता च॑ सजा॒तांस्ते॑ बलि॒हृतः॑ कृणोतु ॥ (६)
हे अग्नि देव! तुम सामर्थ्य वाले होने के कारण शत्रुओं को पराजित करते हो. तुम बुरे कर्म करने वाले हमारे शत्रुओं को नीचे की ओर मुंह कर के गिराओ. हे यजमान! कारीगर के द्वारा बनाई गई यह शाला तुझे भेंट लाने वाले पुत्र, पौत्र आदि से संपन्न करे. (६)
O God of Agni! You defeat enemies because you are powerful. You bring down our enemies who do evil deeds. O host! This school made by the artisan should be endowed with the son, grandson etc. who bring you gifts. (6)
अथर्ववेद (कांड 11)
सा॒कं स॑जा॒तैः पय॑सा स॒हैध्युदु॑ब्जैनां मह॒ते वी॒र्याय । ऊ॒र्ध्वो नाक॒स्याधि॑ रोह वि॒ष्टपं॑ स्व॒र्गो लो॒क इति॒ यं वद॑न्ति ॥ (७)
हे यजमान! तू समान जन्म वाले पुरुषों के साथ कर्मफल के सहित वृद्धि को प्राप्त हो एवं इस पत्नी को अधिक वीर्य प्राप्त करने हेतु स्वाभिमानी बने. हे यजमान! तू देहांत के पश्चात उस स्वर्ग में पहुंच, जिसे उत्तम कर्मो का फल कहा जाता है. (७)
O host! May you attain growth with the fruits of karma with men of equal birth and become self-respecting to get more semen to this wife. O host! After your death, you reach the heaven, which is called the fruit of good deeds. (7)
अथर्ववेद (कांड 11)
इ॒यं म॒ही प्रति॑ गृह्णातु॒ चर्म॑ पृथि॒वी दे॒वी सु॑मन॒स्यमा॑ना । अथ॑ गच्छेम सुकृ॒तस्य॑ लो॒कम् ॥ (८)
देवगण की यह भूमि बिछे हुए चर्म को स्वीकार करे एवं हमारे प्रति कोमल हृदय बन कर दया करे. पृथ्वी की कृपा के कारण हम यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्ग में पहुंचें. (८)
May this land of gods accept the lying skin and have compassion for us with a soft heart. Due to the grace of the earth, we should reach heaven as the fruit of yajna. (8)