हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
स॒त्यं बृ॒हदृ॒तमु॒ग्रं दी॒क्षा तपो॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञः पृ॑थि॒वीं धा॑रयन्ति । सा नो॑ भू॒तस्य॒ भव्य॑स्य॒ पत्न्यु॒रुं लो॒कं पृ॑थि॒वी नः॑ कृणोतु ॥ (१)
पृथ्वी को धारण करने वाले ब्रह्म, तप, यज्ञदीक्षा तथा विशाल रूप में फैले हुए जल हैं. इस पृथ्वी ने भूत काल के जीवों का पालन किया था और भविष्य काल के जीवों का भी पालन करेगी. इस प्रकार की पृथ्वी हमें निवास के हेतु विस्तृत स्थान प्रदान करे. (१)
Brahman, tapa, yajnadiksha and vast form spread water are those who hold the earth. This earth had followed the creatures of the past and will also follow the creatures of the future. This type of earth gives us a wide space to live. (1)

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
अ॑संबा॒धं ब॑ध्य॒तो मा॑न॒वानां॒ यस्या॑ उ॒द्वतः॑ प्र॒वतः॑ स॒मं ब॒हु । नाना॑वीर्या॒ ओष॑धी॒र्या बिभ॑र्ति पृथि॒वी नः॑ प्रथतां॒ राध्य॑तां नः ॥ (२)
जिस भूमि पर ऊंचे, नीचे तथा समतल स्थान हैं तथा जो अनेक प्रकार की सामर्थ्य वाली जड़ीबूटियों को धारण करती है, वह भूमि हमें सभी प्रकार तथा पूर्ण रूप से प्राप्त हो और हमारी सभी कामनाओं को पूर्ण करे. (२)
The land on which there are high, low and flat places and which holds herbs with many types of strength, that land should be attained by us in all respects and completely and fulfill all our wishes. (2)

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यस्यां॑ समु॒द्र उ॒त सिन्धु॒रापो॒ यस्या॒मन्नं॑ कृ॒ष्टयः॑ संबभू॒वुः । यस्या॑मि॒दं जिन्व॑ति प्रा॒णदेज॒त्सा नो॒ भूमिः॑ पूर्व॒पेये॑ दधातु ॥ (३)
यह पृथ्वी सागरों, नदियों, झरनों और सरोवरों के जल से सुशोभित है. इस पृथ्वी पर कृषि की जाती है, जिस से अन्न उत्पन्न होता है. उस अन्न से संसार के प्राणवान मनुष्य, पशु आदि तृप्ति पाते हैं. इस प्रकार की पृथ्वी हमें उस प्रदेश में प्रतिष्ठित करे, जहां पर रसदार फल उत्पन्न होते हैं. (३)
This earth is adorned with the water of the oceans, rivers, springs and lakes. Agriculture is done on this earth, from which food is produced. With that food, the living human beings, animals, etc. of the world get satisfaction. May this kind of earth establish us in the region where juicy fruits are produced. (3)

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यस्या॒श्चत॑स्रः प्र॒दिशः॑ पृथि॒व्या यस्या॒मन्नं कृ॒ष्टयः॑ संबभू॒वुः । या बिभ॑र्ति बहु॒धा प्रा॒णदेज॒त्सा नो॒ भूमि॒र्गोष्वप्यन्ने॑ दधातु ॥ (४)
जिस पृथ्वी पर चार दिशाएं हैं, जिस पर अन्न उत्पन्न होता है और जिस पर किसान खेती करते हैं तथा जो सांस लेने वाले एवं गतिशील प्राणियों को धारण करती है, वह पृथ्वी हमारे लिए दुधारू गाएं और अन्न धारण करे. (४)
The earth on which there are four directions, on which food is produced and on which farmers cultivate and which holds breathing and moving creatures, that earth should sing milch and eat food for us. (4)

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यस्यां॒ पूर्वे॑ पूर्वज॒ना वि॑चक्रि॒रे यस्यां॑ दे॒वा असु॑रान॒भ्यव॑र्तयन् । गवा॒मश्वा॑नां॒ वय॑सश्च वि॒ष्ठा भगं॒ वर्चः॑ पृथि॒वी नो॑ दधातु ॥ (५)
हमारे पूर्व पुरुषों अर्थात्‌ पूर्वजों ने जिस पृथ्वी पर अनेक प्रशंसनीय कार्य किए, जिस पृथ्वी पर देवों ने अत्याचारी दैत्यों के साथ संग्राम किया तथा जो पृथ्वी गायों, घोड़ों तथा पक्षियों को आश्रय प्रदान करने वाली है, वह पृथ्वी हमें तेज और ऐश्वर्य प्रदान करे. (५)
May the earth on which our ancestors did many commendable things, on which the gods fought with tyrannical demons and the earth which is going to provide shelter to cows, horses and birds, may that earth give us glory and wealth. (5)

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
वि॑श्वंभ॒रा व॑सु॒धानी॑ प्रति॒ष्ठा हिर॑ण्यवक्षा॒ जग॑तो नि॒वेश॑नी । वै॑श्वान॒रं बिभ्र॑ती॒ भूमि॑र॒ग्निमिन्द्रऋ॑षभा॒ द्रवि॑णे नो दधातु ॥ (६)
जो पृथ्वी वनों को धारण करने वाली तथा संसार के प्राणियों का भरणपोषण करने वाली है, जो पृथ्वी अपने सीने अर्थात्‌ खदानों में स्वर्ण को धारण करती है तथा वैश्वानर अग्नि को आश्रय प्रदान करती है, वह पृथ्वी हमारे लिए धन प्रदान करे. (६)
The earth which holds the forests and sustains the creatures of the world, the earth which holds gold in its chest i.e. mines and provides shelter to the global agni, that earth will provide wealth for us. (6)

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यां रक्ष॑न्त्यस्व॒प्ना वि॑श्व॒दानीं॑ दे॒वा भूमिं॑ पृथि॒वीमप्र॑मादम् । सा नो॒ मधु॑ प्रि॒यं दु॑हा॒मथो॑ उक्षतु॒ वर्च॑सा ॥ (७)
देवगण जाग्रत रहते हुए अथवा सावधान रहते हुए जिस पृथ्वी की रक्षा करते हैं, वह पृथ्वी हमें मधु, धन एवं बल से युक्त करे. (७)
May the earth that the devas protect while awake or careful, may the earth contain us with honey, wealth and strength. (7)

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यार्ण॒वेऽधि॑ सलि॒लमग्र॒ आसी॒द्यां मा॒याभि॑र॒न्वच॑रन्मनी॒षिणः॑ । यस्या॒ हृद॑यं पर॒मे व्योमन्त्स॒त्येनावृ॑तम॒मृतं॑ पृथि॒व्याः । सा नो॒ भूमि॒स्त्विषिं॒ बलं॑ रा॒ष्ट्रे द॑धातूत्त॒मे ॥ (८)
जो पृथ्वी पहले सागर के जल में डूबी हुई थी, मनीषीजनों ने अनेक प्रकार के कार्य करते हुए, जिस पृथ्वी पर विचरण किया था, जिस का हृदय विशाल आकाश में स्थित है, वह मरण रहित पृथ्वी हमें श्रेष्ठ राष्ट्र, बल और दीप्ति प्रदान करे. (८)
May the earth which was earlier submerged in the water of the ocean, the mystics doing many types of work, the earth on which the heart is located in the vast sky, may that deathless earth give us the best nation, strength and radiance. (8)
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