हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
उ॒देहि॑ वाजि॒न्यो अ॒प्स्वन्तरि॒दं रा॒ष्ट्रं प्र वि॑श सू॒नृता॑वत् । यो रोहि॑तो॒ विश्व॑मि॒दं ज॒जान॒ स त्वा॑ रा॒ष्ट्राय॒ सुभृ॑तं बिभर्तु ॥ (१)
हे सूर्य! तुम अंतरिक्ष में क्यों छिपे हो, तुम उदय प्राप्त करो. तुम सत्य और प्रिय वाणी से युक्त हो कर यहां आओ. इस प्रकार के सूर्य देव ने संसार का प्रकाशन किया. सूर्य देव तुम्हें राष्ट्र के भरणकर्ता के रूप में पुष्ट करे. (१)
O sun! Why are you hiding in space, you get rise. Come here with truth and love speech. This kind of Sun God illuminated the world. May the Sun God strengthen you as the destroyer of the nation. (1)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
उद्वाज॒ आ ग॒न्यो अ॒प्स्वन्तर्विश॒ आ रो॑ह॒ त्वद्यो॑नयो॒ याः । सोमं॒ दधा॑नो॒ऽप ओष॑धी॒र्गाश्चतु॑ष्पदो द्वि॒पद॒ आ वे॑शये॒ह ॥ (२)
हे सूर्य! जल में रहने वाली जो प्रजाएं तथा जलप्रद अन्न हैं, वे तुम्हारे पास आएं. तुम जल पर चढ़ो और सोम को धारण करते हुए जल, ओषधि तथा दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं को इस राष्ट्र में प्रविष्ट करो. (२)
O sun! Let the people who live in water and the water-rich food come to you. You climb on the water and enter this nation with water, medicines and two-legged humans and four-legged animals, wearing Soma. (2)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यू॒यमु॒ग्रा म॑रुतः पृश्निमातर॒ इन्द्रे॑ण यु॒जा प्र मृ॑णीत॒ शत्रू॑न् । आ वो॒ रोहि॑तः शृणवत्सुदानवस्त्रिष॒प्तासो॑ मरुतः स्वादुसंमुदः ॥ (३)
हे मरुद्गण! तुम इंद्र के सखा हो. तुम शत्रुओं का नाश करो. तुम स्वादिष्ट पदार्थो से प्रसन्न होने वाले हो और सुंदर वर्षा प्रदान करते हो. सूर्य तुम्हारी बात सुनें. (३)
O Desertion! You are Indra's friend. Destroy your enemies. You are going to be happy with delicious foods and provide beautiful rain. Sun listen to you. (3)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
रुहो॑ रुरोह॒ रोहि॑त॒ आ रु॑रोह॒ गर्भो॒ जनी॑नां ज॒नुषा॑मु॒पस्थ॑म् । ताभिः॒ संर॑ब्ध॒मन्व॑विन्द॒न्षडु॒र्वीर्गा॒तुं प्र॒पश्य॑न्नि॒ह रा॒ष्ट्रमाहाः॑ ॥ (४)
सूर्य उदय होते हुए आकाश पर चढ़ रहे हैं. छह उर्वियों की प्राप्ति के हेतु वे राष्ट्र को नित्यप्रति देखते हुए उर्वियों को प्राप्त करते हैं. (४)
The sun is rising and climbing the sky. To attain the six urvis, they get the urvis while looking at the nation every day. (4)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
आ ते॑ रा॒ष्ट्रमि॒ह रोहि॑तोऽहार्षी॒द्व्यास्थ॒न्मृधो॒ अभ॑यं ते अभूत् । तस्मै॑ ते द्यावापृथि॒वी रे॒वती॑भिः॒ कामं॑ दुहाथामि॒ह शक्व॑रीभिः ॥ (५)
हे यजमान! तेरे राष्ट्र पर सूर्य आ गए हैं, इसलिए तू युद्ध का भय मत कर. आकाश, पृथ्वी और धन देने वाली ऋचाएं तेरे लिए कामनाओं का दोहन करें. (५)
O host! The sun has come upon your nation, so do not be afraid of war. Let the sky, earth and wealth-giving riches exploit the wishes for you. (5)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
रोहि॑तो॒ द्यावा॑पृथि॒वी ज॑जान॒ तत्र॒ तन्तुं॑ परमे॒ष्ठी त॑तान । तत्र॑ शिश्रिये॒ऽज एक॑पा॒दोऽदृं॑ह॒द्द्यावा॑पृथि॒वी बले॑न ॥ (६)
सूर्य ने आकाश और पृथ्वी को प्रकट किया. सूर्य ने उस में तंतु को बढ़ाया. एक पाद अज ने वहां आश्रय ले कर आकाश और पृथ्वी को बल से युक्त किया. (६)
The sun revealed the sky and the earth. The sun extended the fibers in it. One foot aj took shelter there and made the sky and the earth with force. (6)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
रोहि॑तो॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॑दृंह॒त्तेन॒ स्व स्तभि॒तं तेन॒ नाकः॑ । तेना॒न्तरि॑क्षं॒ विमि॑ता॒ रजां॑सि॒ तेन॑ दे॒वा अ॒मृत॒मन्व॑विन्दन् ॥ (७)
सूर्य ने आकाश और पृथ्वी को दृढ़ किया. उसी सूर्य ने दुःखों से रहित आकाश को स्थिर किया. उसी सूर्य ने अंतरिक्ष तथा वन्य सुख लोकों को बनाया. देवताओं ने उसी से अमृतत्व प्राप्त किया है. (७)
The sun strengthened the heavens and the earth. The same sun stabilized the sky without sorrows. The same sun created space and wild pleasures. The gods have attained nectar from him. (7)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
वि रोहि॑तो अमृशद्वि॒श्वरू॑पं समाकुर्वा॒णः प्र॒रुहो॒ रुह॑श्च । दिवं॑ रू॒ढ्वा म॑ह॒ता म॑हि॒म्ना सं ते॑ रा॒ष्ट्रम॑नक्तु॒ पय॑सा घृ॒तेन॑ ॥ (८)
रूह और प्ररूह अर्थात्‌ उगने वाले लता वृक्ष आदि को भलीभांति प्रकट करने वाले सूर्य ने सब शरीरों का स्पर्श किया. हे यजमान! वे सूर्य अपने महत्त्व से तेरे राष्ट्र को घृत और दूध से संपन्न करें. (८)
The sun, which expressed the soul and praruh i.e. the creeper tree that grows, etc., touched all the bodies. O host! May those suns, by their importance, fill your nation with ghee and milk. (8)
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