हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
य इ॒मे द्यावा॑पृथि॒वी ज॒जान॒ यो द्रापिं॑ कृ॒त्वा भुव॑नानि॒ वस्ते॑ । यस्मि॑न्क्षि॒यन्ति॑ प्र॒दिशः॒ षडु॒र्वीर्याः प॑त॒ङ्गो अनु॑ वि॒चाक॑शीति । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (१)
इस आकाश और पृथ्वी को उन्होंने प्रकट किया जो सभी लोकों को आच्छादित करते हैं, जिन में छह उर्वियां और दिशाएं निवास करती हैं. जिन दिशाओं को वे ही प्रकाशित करते हैं, उन क्रोधपूर्ण सूर्य का जो अपमान करता है अथवा विद्वान्‌ ब्राह्मण की हिंसा करता है अथवा कष्ट देता है, हे रोहित देव! तुम उस को कंपित करो तथा उसे क्षीण करते हुए बंधन में डाल दो. (१)
He revealed this sky and earth that covers all the worlds, in which six bodies and directions reside. The directions he illuminates, the angry sun that insults the learned Brahmin, who commits violence or suffering, O Rohit Dev! You make him tremble and weaken him and put him in bondage. (1)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
यस्मा॒द्वाता॑ ऋतु॒था पव॑न्ते॒ यस्मा॑त्समु॒द्रा अधि॑ वि॒क्षर॑न्ति । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (२)
जिस देवता के प्रभाव से वायु ऋतुओं के अनुसार चलती है तथा समुद्र प्रभावित होते हैं, क्रोध में भरे हुए सूर्य का जो अपमान करता है अथवा विद्वान्‌ ब्राह्मण की हिंसा करता है, हे रोहित देव! उस ब्रह्मघाती को कंपित करते हुए क्षीण करो और बंधन में डाल दो. (२)
The deity under whose influence the air moves according to the seasons and the seas are affected, who insults the sun full of anger or does violence to the learned Brahmin, O Rohit Dev! Weaken that brahmaghati by staggering and put it in bondage. (2)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
यो मा॒रय॑ति प्रा॒णय॑ति॒ यस्मा॑त्प्रा॒णन्ति॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (३)
जो मनुष्य में प्राण भरते हैं, जो मनुष्य की हिंसा करते हैं, उन के द्वारा सभी प्राणी श्वास लेते और प्रश्नास के रूप में छोड़ते हैं, क्रोध में भरे उस देवता का जो अपमान करता है अथवा विद्वान्‌ ब्राह्मण की हिंसा करता है, उस ब्रह्मघाती को कंपित करते हुए हे रोहित देव! क्षीण करो एवं बंधन में डालो. (३)
Those who infuse life in man, through those who commit violence against man, all beings breathe and leave in the form of question, who insults that god full of anger or commits violence of a learned Brahmin, trembling that Brahmaghati, O Rohit Dev! Weaken and put in bondage. (3)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
यः प्राणे॑न॒ द्यावा॑पृथि॒वी त॒र्पय॑त्यपा॒नेन॑ समु॒द्रस्य॑ ज॒ठरं॒ यः पिप॑र्ति । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (४)
जो देवता प्राण, आकाश और पृथ्वी को तृप्त करता है तथा अपमान से समुद्र के पेट को पालता है, क्रोध में भरे उस के अपराधी और विद्वान्‌ ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव कंपित करते हुए क्षीण बनाओ एवं बंधन में डालो. (४)
The god who satisfies the life, the sky and the earth and nurtures the stomach of the sea with humiliation, make the violent of his criminal and learned Brahmin filled in anger, O Rohit Dev, staggering and put it in bondage. (4)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
यस्मि॑न्वि॒राट्प॑रमे॒ष्ठी प्र॒जाप॑तिर॒ग्निर्वै॑श्वान॒रः स॒ह प॒ङ्क्त्या श्रि॒तः । यः पर॑स्य प्रा॒णं प॑र॒मस्य॒ तेज॑ आद॒दे । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (५)
जिस में विराट परमेष्ठी वैश्वानर पंक्ति, प्रजा और अग्नि सहित निवास करते हैं, जिस ने उत्कृष्ट प्राण के महान तेज को धारण किया है, उन क्रोधवंत देवता के अपराधी तथा विद्वान्‌ ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण करो तथा अपने बंधन में बांध लो. (५)
In which Virat Parmeshti Resides with Vaishvanar Row, Subjects and Agni, who has possessed the great glory of the excellent soul, the criminal of those angry gods and the violent of the learned Brahmin, O Rohit Dev! Weaken by staggering and tie in your bond. (5)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
यस्मि॒न्षडु॒र्वीः पञ्च॒ दिशो॒ अधि॑श्रि॒ताश्चत॑स्र॒ आपो॑ य॒ज्ञस्य॒ त्रयो॒ऽक्षराः॑ । यो अ॑न्त॒रा रोद॑सी क्रु॒द्धश्चक्षु॒षैक्ष॑त । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (६)
पांच दिशाएं, छह उर्वियां, चार जलों तथा यज्ञ के तीन अक्षर जिस में आश्रित हैं, जो आकाश और पृथ्वी के मध्य अपने क्रोधपूर्ण नेत्र से देखता है, उस क्रोधवान देवता के अपराधी तथा विद्वान्‌ ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाश में बांध लो. (६)
O Rohit Dev, the criminal of the angry deity and the violent of the learned Brahmin, the five directions, the six urvis, the four waters and the three letters of the yajna in which they are dependent, who sees with his angry eye between the sky and the earth, O Rohit Dev! Make the staggering attenuated and tie in your loop. (6)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
यो अ॑न्ना॒दो अन्न॑पतिर्ब॒भूव॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॑रु॒त यः । भू॒तो भ॑वि॒ष्यद्भुव॑नस्य॒ यस्पतिः॑ । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (७)
जो ब्रह्मणस्पति हैं, जो अन्न के पालक और भक्षक हैं, जो भूत, भविष्य और लोक के स्वामी हैं, उन क्रोधयुक्त देव के अपराधी तथा विद्वान्‌ ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों में बांध लो. (७)
Those who are Brahmanaspati, who are the guardians and eaters of food, who are the masters of the past, the future and the world, the criminal of those angry gods and the violent of the learned Brahmin, O Rohit Dev! Make the weak by staggering and tie it in your loops. (7)

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
अ॑होरा॒त्रैर्विमि॑तं त्रिं॒शद॑ङ्गं त्रयोद॒शं मासं॒ यो नि॒र्मिमी॑ते । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (८)
जिन्होंने तीन दिनरात्रि का समूह बना कर तेरहवें अधिक मास का निर्माण किया, ऐसे क्रोधयुक्त देव के अपराधी और विद्वान्‌ ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों में बांध लो. (८)
Those who formed the thirteenth more month by forming a group of three days and nights, o Rohit Dev, the criminal of such an angry god and the violent of the learned Brahmin! Make it weak by staggering and tie it in your loops. (8)
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