अथर्ववेद (कांड 15)
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यश्चतुर्थी रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (७)
जिस गृहस्थ के घर में ऐसा व्रात्य चौथी रात निवास करता है तो उस के फल के रूप में वह गृहस्थ पुण्यात्माओं के सभी लोकों को अपने लिए मुक्त कर लेता है. (७)
कांड 15 → सूक्त 13 → मंत्र 7 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation