हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 15.4.3

कांड 15 → सूक्त 4 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 15)

अथर्ववेद: | सूक्त: 4
वा॑स॒न्तावे॑नं॒मासौ॒ प्राच्या॑ दि॒शो गो॑पायतो बृ॒हच्च॑ रथन्त॒रं चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (३)
जो यह बात जानता है, वसंत ऋतु के दो महीने, पूर्व दिशा की ओर से उस की रक्षा करते हैं. बृहत्‌ साम और रथंतर उस के अनुकूल हो जाते हैं. (३)
Whoever knows this, two months of spring, protect him from the east direction. Greater sama and rathantar adapt to it. (3)