हरि ॐ
अथर्ववेद (Atharvaved)
अथर्ववेद (कांड 15)
स वि॒शोऽनु॒व्यचलत् ॥ (१)
उसने प्रजाओं के अनुकूल व्यवहार किया. (१)
He behaved according to the subjects. (1)
अथर्ववेद (कांड 15)
तं स॒भा च॒समि॑तिश्च॒ सेना॑ च॒ सुरा॑ चानु॒व्यचलन् ॥ (२)
इस से समिति, सभा, सेना और सुख उस के अनुकूल हुए. (२)
This made the committee, the assembly, the army and happiness favorable to him. (2)
अथर्ववेद (कांड 15)
स॒भाया॑श्च॒ वै ससमि॑तेश्च॒ सेना॑याश्च॒ सुरा॑याश्च प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (३)
इस बात को जानने वाला सभा, समिति, सेनाओं की सुरानुकूलता प्राप्त करता है. (३)
The Assembly, Committee, which knows this, attains the harmony of the armies. (3)