हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 15)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
स वि॒शोऽनु॒व्यचलत् ॥ (१)
उसने प्रजाओं के अनुकूल व्यवहार किया. (१)
He behaved according to the subjects. (1)

अथर्ववेद (कांड 15)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
तं स॒भा च॒समि॑तिश्च॒ सेना॑ च॒ सुरा॑ चानु॒व्यचलन् ॥ (२)
इस से समिति, सभा, सेना और सुख उस के अनुकूल हुए. (२)
This made the committee, the assembly, the army and happiness favorable to him. (2)

अथर्ववेद (कांड 15)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
स॒भाया॑श्च॒ वै ससमि॑तेश्च॒ सेना॑याश्च॒ सुरा॑याश्च प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (३)
इस बात को जानने वाला सभा, समिति, सेनाओं की सुरानुकूलता प्राप्त करता है. (३)
The Assembly, Committee, which knows this, attains the harmony of the armies. (3)