हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 16)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
वि॒द्म ते॑स्वप्न ज॒नित्रं॒ ग्राह्याः॑ पु॒त्रोऽसि॑ य॒मस्य॒ कर॑णः ॥ (१)
हे स्वप्न! तू ग्राहय पिशाचों से उत्पन्न हुआ है तथा यम को प्राप्त करने वाला है. मैं तेरी उत्पत्ति जानता हूं. (१)
O dream! You are born of acceptable vampires and are about to receive Yama. I know your origin. (1)

अथर्ववेद (कांड 16)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
अन्त॑कोऽसिमृ॒त्युर॑सि ॥ (२)
हे स्वप्र! तू जीवन का अंत करने वाली मृत्यु है. (२)
O self- You are the death that ends life. (2)

अथर्ववेद (कांड 16)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
तं त्वा॑ स्वप्न॒तथा॒ सं वि॑द्म॒ स नः॑ स्वप्न दुः॒ष्वप्न्या॑त्पाहि ॥ (३)
हे प्रश्न! हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्नों से बचाओ. (३)
This is the question! We know you very well. You save us from nightmares. (3)

अथर्ववेद (कांड 16)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
वि॒द्म ते॑स्वप्न ज॒नित्रं॒ निरृ॑त्याः पु॒त्रोऽसि॑ य॒मस्य॒ कर॑णः । अन्त॑कोऽसिमृ॒त्युर॑सि । तं त्वा॑ स्वप्न॒ तथा॒ सं वि॑द्म॒ स नः॑ स्वप्नदुः॒ष्वप्न्या॑त्पाहि ॥ (४)
हे स्वमन! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम निर्त्रति अर्थात्‌ पाप देवता के पुत्र हो तथा यम देव के साधन हो. तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. हम तुम्हारे इस रूप को जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्र से बचाओ. (४)
O self- We know your birth. You are the son of Nirtrati i.e. sin god and the instrument of Yama Dev. You are the end-of-life death. We know this form of yours. You save us from bad self-respect. (4)

अथर्ववेद (कांड 16)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
वि॒द्म ते॑स्वप्न ज॒नित्र॒मभू॑त्याः पु॒त्रोऽसि॑ य॒मस्य॒ कर॑णः । अन्त॑कोऽसिमृ॒त्युर॑सि । तं त्वा॑ स्वप्न॒ तथा॒ सं वि॑द्म॒ स नः॑ स्वप्नदुः॒ष्वप्न्या॑त्पाहि ॥ (५)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम मृत्यु और अभूति अर्थात्‌ दरिद्रता के पुत्र हो. हे स्वप्र! हम तुम्हें भलिभांति जानते हैं. तुम हमारी बुरे स्वप्नों से रक्षा करो. (५)
O dream! We know your origin. You are the sons of death and abhuti i.e. poverty. O self- We know you very well. You protect us from bad dreams. (5)

अथर्ववेद (कांड 16)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
वि॒द्म ते॑स्वप्न ज॒नित्रं॒ निर्भू॑त्याः पु॒त्रोऽसि॑ य॒मस्य॒ कर॑णः । अन्त॑कोऽसिमृ॒त्युर॑सि । तं त्वा॑ स्वप्न॒ तथा॒ सं वि॑द्म॒ स नः॑ स्वप्नदुः॒ष्वप्न्या॑त्पाहि ॥ (६)
हे स्वप्र! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम निर्भूति अर्थात्‌ निर्धनता के पुत्र और यमराज के साधन हो. हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं, इसलिए तुम हमें बुरे स्वप्र से बचाओ. (६)
O self- We know your origin. You are nirbhuti i.e. the son of poverty and the instrument of Yamraj. We know you very well, so you save us from evil self-respect. (6)

अथर्ववेद (कांड 16)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
वि॒द्म ते॑स्वप्न ज॒नित्रं॒ परा॑भूत्याः पु॒त्रोऽसि॑ य॒मस्य॒ कर॑णः । अन्त॑कोऽसिमृ॒त्युर॑सि । तं त्वा॑ स्वप्न॒ तथा॒ सं वि॑द्म॒ स नः॑ स्वप्नदुः॒ष्वप्न्या॑त्पाहि ॥ (७)
हे स्वप्र! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम पराभूति अर्थात्‌ पराजय के पुत्र और यमराज के साधन हो. तुम यमराज के साधन और मृत्यु हो. हम तुम्हारे स्वरूप को भलीभांति जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्रों से बचाओ. (७)
O self- We know your origin. You are the son of parabhuti i.e. defeat and the instrument of Yamraj. You are the instrument and death of Yamraj. We know your nature very well. You save us from evil self-respect. (7)

अथर्ववेद (कांड 16)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
वि॒द्म ते॑स्वप्न ज॒नित्रं॑ देवजामी॒नां पु॒त्रोऽसि॑ य॒मस्य॒ कर॑णः ॥ (८)
हे स्वप्न! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम इंद्रिय विकारों के पुत्र और यम के साधन हो. तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्न से बचाओ. (८)
O dream! We know your birth. You are the son of sense disorders and the instrument of Yama. You are the end-of-life death. We know you very well. You save us from nightmares. (8)
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