हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
ओ चि॒त्सखा॑यंस॒ख्या व॑वृत्यां ति॒रः पु॒रु चि॑दर्ण॒वं ज॑ग॒न्वान् । पि॒तुर्नपा॑त॒मा द॑धीतवे॒धा अधि॒ क्षमि॑ प्रत॒रं दीध्या॑नः ॥ (१)
यमी का कथन-मैं समान प्रसिद्धि वाले मित्र यम को आदर भाव के अनुकूल बनाती हूं. समुद्र तट के समीप वाले द्वीप में चलते हुए यम अपने पुत्र को मुझ में स्थापित करें. हे यम! तुम्हारी प्रसिद्धि सभी लोकों में है. तुम सदा तेज से दीप्त रहो. (१)
Yami's statement - I make Yama, a friend of equal fame, suited to respect. Yama should establish his son in me while walking in the island near the beach. O Yama! Your fame is in all worlds. May you always be bright. (1)

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
न ते॒ सखा॑स॒ख्यं व॑ष्ट्ये॒तत्सल॑क्ष्मा॒ यद्विषु॑रूपा॒ भव॑ति । म॒हस्पु॒त्रासो॒ असु॑रस्यवी॒रा दि॒वो ध॒र्तार॑ उर्वि॒या परि॑ ख्यन् ॥ (२)
यम का कथन-मैं तेरा सोदर अर्थात्‌ एक ही पेट से उत्पन्न हुआ तेरा मित्र हूं. पर मैं भाई और बहन के समागम संबंधी मित्र भाव की इच्छा नहीं करता हूं. तू एक उदर से उत्पन्न हो कर भी मेरी पत्नी बनने की कामना करती है. मैं ऐसे मित्रभाव को स्वीकार नहीं करता हूं शत्रुओं को दबाने वाले महाबली रुद्र के पुत्र मरुद्गण भी इस की निंदा करेंगे. (२)
Yama's statement - I am your friend born from your son i.e. one stomach. But I do not wish to be friends with brother and sister. You are born from one stomach and wish to be my wife. I do not accept such friendship, marudgans, sons of Mahabali Rudra, who suppress enemies, will also condemn it. (2)

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
उ॒शन्ति॑ घा॒ तेअ॒मृता॑स ए॒तदेक॑स्य चित्त्य॒जसं॒ मर्त्य॑स्य । नि ते॒ मनो॒ मन॑सि धाय्य॒स्मेजन्युः॒ पति॑स्त॒न्वमा वि॑विष्याः ॥ (३)
यमी-हे यम! मरुद्गण उस मार्ग की इच्छा करते हैं, जिस का मैं ने तुम से निवेदन किया है. इसलिए तुम अपने मन को मेरी ओर लगाओ. फिर तुम संतान को उत्पन्न करने वाले मेरे पति बनते हुए भाई के भाव को छोड़ कर मुझ में प्रविष्ट हो जाओ. (३)
Yami- O Yama! The Deserts desire the way I have requested you. So you turn your mind to me. Then you become my husband who produces children and leave the feeling of brother and enter me. (3)

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
न य॑त्पु॒राच॑कृ॒मा कद्ध॑ नू॒नमृ॒तं वद॑न्तो॒ अनृ॑तं॒ रपे॑म । ग॑न्ध॒र्वो अ॒प्स्वप्या॑ च॒योषा॒ सा नौ॒ नाभिः॑ पर॒मं जा॒मि तन्नौ॑ ॥ (४)
यम-हे यमी! असत्य बात को हम सत्य भाषण करने वाले किस प्रकार सत्य कहें? जल को धारण करने वाले सूर्य भी आकाश में अपनी पत्नी के सहित स्थित हैं. इसलिए एक ही माता और पिता वाले हम दोनों उन्हीं के सामने तेरी इच्छा पूर्ण करने में समर्थ न होंगे. (४)
Yama- O Yummy! How do we truth-makers call the untruth the truth? The sun, which holds water, is also located in the sky with his wife. Therefore, both of us with the same mother and father will not be able to fulfill your wish in front of them. (4)

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
गर्भे॒ नु नौ॑जनि॒ता दम्प॑ती कर्दे॒वस्त्वष्टा॑ सवि॒ता वि॒श्वरू॑पः । नकि॑रस्य॒ प्र मि॑नन्तिव्र॒तानि॒ वेद॑ नाव॒स्य पृ॑थि॒वी उ॒त द्यौः ॥ (५)
यमी-हे यम! संतान उत्पन्न करने वाले देव ने हम दोनों को माता के उदर में ही दांपत्य बंधन में बांध दिया है. उस देव के कर्म का जो फल है, उसे कौन निष्फल कर सकता है. त्वष्टा देव के गर्भ में ही हमारे दंपती बनाने वाले कर्म को आकाश और पृथ्वी दोनों जानते हैं. इस कारण यह असत्य नहीं है. (५)
Yami - Hey Yama! The God who produced children has tied both of us in the womb of the mother in the marital bond. Who can defeat the fruit of that God's deeds? Both the sky and the earth know the karma that makes our couples in the womb of Ttvashta Dev. For this reason it is not untrue. (5)

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
को अ॒द्ययु॑ङ्क्ते धु॒रि गा ऋ॒तस्य॒ शिमी॑वतो भा॒मिनो॑ दुर्हृणा॒यून्।आ॒सन्नि॑षून्हृ॒त्स्वसो॑ मयो॒भून्य ए॑षां भृ॒त्यामृ॒णध॒त्स जी॑वात् ॥ (६)
यम-हे यमी! सत्य का भार वहन करने के निमित्त अपनी वाणी रूप वृषभ को कौन नियुक्त कर सकता है. कर्मठ, तेजस्वी, क्रोध और लज्जा से हीन तथा अपने शब्दों से श्रोताओं के हृदय में बैठने वाला जो पुरुष सत्य वचनों से ही वृद्धि करता है, वह उस के फल के कारण दीर्घजीवी होता है. (६)
Yama- O Yummy! Who can appoint Taurus, the form of his speech, to bear the burden of truth? The man who is diligent, brilliant, devoid of anger and shame and sits in the heart of the audience with his words, who grows only by the words of truth, is long-lived because of its fruit. (6)

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
को अ॒स्य वे॑दप्रथ॒मस्याह्नः॒ क ईं॑ ददर्श॒ क इ॒ह प्र वो॑चत् । बृ॒हन्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒धाम॒ कदु॑ ब्रव आहनो॒ वीच्या॒ नॄन् ॥ (७)
यमी-हे यम! हमारे प्रथम दिन को कौन जान रहा है और कौन देख रहा है? फिर कौन पुरुष इस बात को दूसरों से कह सकेगा? दिन मित्र देवता का स्थान है. ये दोनों ही विशाल हैं. इसलिए मेरी इच्छा के प्रतिकूल मुझे क्लेश देने वाले तुम अनेक कर्मों वाले मनुष्यों के संबंध में ऐसा किस प्रकार कहते हो. (७)
Yami- O Yama! Who knows our first day and who is watching? Then which man can say this to others? The day is the place of friendly deity. Both of them are huge. Therefore, how do you say this in relation to men with many deeds who cause me tribulation against My will? (7)

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
य॒मस्य॑ माय॒म्यं काम॒ आग॑न्त्समा॒ने योनौ॑ सह॒शेय्या॑य । जा॒येव॒ पत्ये॑ त॒न्वंरिरिच्यां॒ वि चि॑द्वृहेव॒ रथ्ये॑व च॒क्रा ॥ (८)
मेरी इच्छा है कि पति को अपना शरीर अर्पण करने वाली पत्नी के समान यम को अपनी देह अर्पित करूं. वे दोनों पहिए के समान मार्ग में एकदूसरे से मिलते हैं. मैं उसी प्रकार की हो जाऊं. (८)
I wish to offer my body to Yama like a wife who offered her body to my husband. They meet each other in the same path as the two wheels. I'll be the same. (8)
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