अथर्ववेद (कांड 2)
यथा॑ स॒त्यं चानृ॑तं च॒ न बि॑भी॒तो न रिष्य॑तः । ए॒वा मे॑ प्राण॒ मा बि॑भेः ॥ (५)
जिस प्रकार सत्य और असत्य न किसी से भयभीत होते हैं, न आशंकित होते हैं और न कभी नष्ट होते हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी मत डरो. (५)
Just as truth and falsehood are neither afraid of anyone, nor apprehensive, nor ever destroyed, O my life! Similarly, don't be afraid. (5)