हरि ॐ
अथर्ववेद (Atharvaved)
Home » Atharvaved » Kand 2 » Sukta 19 अथर्ववेद (कांड 2) अग्ने॒ यत्ते॒ तप॒स्तेन॒ तं प्रति॑ तप॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ (१)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो तपाने की शक्ति है, उस से उस को संतप्त करो जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं. (१)
O God of Agni! Anger him who hates us or the one we hate with the one you have the power to heat. (1)
अथर्ववेद (कांड 2) अग्ने॒ यत्ते॒ हर॒स्तेन॒ तं प्रति॑ हर॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ (२)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो संहार की शक्ति है, उस के द्वारा उस का संहार करो जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं. (२)
O God of Agni! Kill him who hates us or whom we hate by the power of destruction that you have. (2)
अथर्ववेद (कांड 2) अग्ने॒ यत्ते॒ऽर्चिस्तेन॒ तं प्रत्य॑र्च॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ (३)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो दीप्ति है, उस के द्वारा उन्हें जलाने के लिए दीप्त बनो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (३)
O God of Agni! Be overwhelmed by the glow you have to burn those who hate us or those we hate. (3)
अथर्ववेद (कांड 2) अग्ने॒ यत्ते॑ शो॒चिस्तेन॒ तं प्रति॑ शोच॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ (४)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो दूसरों को शोकमग्न करने की शक्ति है, उस के द्वारा तुम उन्हें शोक मग्न करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (४)
O God of Agni! Through the power you have to grieve others, grieve those who hate us or those we hate. (4)
अथर्ववेद (कांड 2) अग्ने॒ यत्ते॒ तेज॒स्तेन॒ तम॑ते॒जसं॑ कृणु॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ (५)
हे अग्नि देव! तुम्हारा जो तेज है, उस से उन लोगों को तेजहीन बनाओ जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं (५)
O God of Agni! Make those who hate us or those whom we hate sharp with your glory.