अथर्ववेद (कांड 2)
वायो॒ यत्ते॒ तप॒स्तेन॒ तं प्रति॑ तप॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ (१)
हे वायु देव! तुम्हारी जो संताप पहुंचाने की शक्ति है, उस से उन्हें संताप पहुंचाओ जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (१)
O Vayu Dev! With the power to spread your anger, anger those who hate us or those we hate. (1)