अथर्ववेद (कांड 2)
जूर्णि॒ पुन॑र्वो यन्तु या॒तवः॒ पुन॑र्हे॒तिः कि॑मीदिनीः । यस्य॒ स्थ तम॑त्त॒ यो वः॒ प्राहै॒त्तम॑त्त॒ स्वा मां॒सान्य॑त्त ॥ (५)
हे प्राणियों के शरीर को वृद्ध बनाने वाली राक्षसी! तूने हमारी ओर दरिद्रता प्रदान करने वाली जो राक्षसियां भेजी हैं, वे हमारी ओर से लौट जाएं. तेरे जो आयुध हैं वे भी लौट जाएं. तेरे अनुचर चोर भी लौट जाएं. तू हमारे जिस शत्रु की है, उसी के पास चली जा तथा उसे खा डाल. जिस प्रयोग करने वाले ने तुझे मेरे पास भेजा है, तू उसी को खा. तू उसी का मांस भक्षण कर. (५)
O demon who makes the bodies of creatures old! Let the demons you have sent to us bring poverty back from us. Let your weapons also return. Your attendant thieves should also return. Go to the enemy you have and eat it. Eat the one who sent you to me. Eat his flesh. (5)