हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 2.31.4

कांड 2 → सूक्त 31 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 31
अन्वा॑न्त्र्यं॒ शीर्ष॒ण्य॑१मथो॒ पार्ष्टे॑यं॒ क्रिमी॑न् । अ॑वस्क॒वं व्य॑ध्व॒रं क्रिमी॒न्वच॑सा जम्भयामसि ॥ (४)
क्रम से आंतों में होने वाले, सिर में होने वाले, तथा पसलियों में स्थित कीटाणुओं को मैं मंत्र के द्वारा नष्ट करता हूं. ये कीटाणु शरीर में प्रवेश करने वाले एवं भांतिभांति के मार्गो से गमन करने वाले हैं. (४)
In order, I destroy the germs in the intestines, in the head, and in the ribs through mantras. These germs enter the body and pass through the paths of various types. (4)