अथर्ववेद (कांड 2)
प्र॑जा॒नन्तः॒ प्रति॑ गृह्णन्तु॒ पूर्वे॑ प्रा॒णमङ्गे॑भ्यः॒ पर्या॒चर॑न्तम् । दिवं॑ गछ॒ प्रति॑ तिष्ठा॒ शरी॑रैः स्व॒र्गं या॑हि प॒थिभि॑र्देव॒यानैः॑ ॥ (५)
हे पशु! इस यज्ञ में तेरे माहात्म्य को जानते हुए अंतरिक्ष में स्थित देव तेरे अंगों की सेवा करते हुए सभी ओर से निकल कर सामने आते हुए तेरे प्राणों को ग्रहण करें. इस के पश्चात तुम देवों के द्वारा गृहीत हो कर स्वर्ग में जाओ तथा वहां दिव्य भोगों के प्रति स्थित बनो. इस यज्ञ के बाद तुम देवों के मार्ग से स्वर्ग में जाओ. (५)
O animal! In this yajna, knowing your greatness, the god located in space, while serving your organs, come out from all sides and take your life. After this, you become accepted by the gods and go to heaven and be situated there towards divine enjoyments. After this yajna, you go to heaven through the path of gods. (5)