हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
अ॒घद्वि॑ष्टा दे॒वजा॑ता वी॒रुच्छ॑पथ॒योप॑नी । आपो॒ मल॑मिव॒ प्राणै॑क्षी॒त्सर्वा॒न्मच्छ॒पथाँ॒ अधि॑ ॥ (१)
पाप का विनाश करने वाली, देवों के द्वारा बनाई गई एवं पाप का निवारण करने वाली दूर्वा मुझ से सभी पापों को इस प्रकार धो कर दूर कर दे, जिस प्रकार पानी मैल को धो डालता है. (१)
Durva, who destroys sin, created by gods and removes sin, washes away all sins from me in such a way that water washes away scum. (1)

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
यश्च॑ साप॒त्नः श॒पथो॑ जा॒म्याः श॒पथ॑श्च॒ यः । ब्र॒ह्मा यन्म॑न्यु॒तः शपा॒त्सर्वं॒ तन्नो॑ अधस्प॒दम् ॥ (२)
द्वेष करने वाले शत्रु से संबंधित एवं बहन से संबंधित जो आक्रोश है तथा ब्राह्मण ने क्रोधित हो कर जो शाप दिया है-ये तीनों प्रकार के शाप मेरे पैर के नीचे रहें. (२)
The anger related to the hostile enemy and the sister and the curse that the Brahmin has given by getting angry - these three types of curses should remain under my feet. (2)

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
दि॒वो मूल॒मव॑ततं पृथि॒व्या अध्युत्त॑तम् । तेन॑ स॒हस्र॑काण्डेन॒ परि॑ णः पाहि वि॒श्वतः॑ ॥ (३)
हे मणि! हमें स्वर्ग की जड़ के समान विस्तृत एवं पृथ्वी के ऊपर विस्तृत असीमित पाप से बचाओ और सभी प्रकार से हमारी रक्षा करो. (३)
O gem! Save us from unlimited sin as wide as the root of heaven and wide on earth and protect us in all respects. (3)

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
परि॒ मां परि॑ मे प्र॒जां परि॑ णः पाहि॒ यद्धन॑म् । अरा॑तिर्नो॒ मा ता॑री॒न्मा न॑स्तारि॒शुर॒भिमा॑तयः ॥ (४)
हे मणि! मेरी, मेरी संतान की एवं मेरे धन की रक्षा करो. शत्रु हमारा अतिक्रमण न करे अर्थात्‌ हमें पराजित न करे. हमारी हत्या करने के इच्छुक पिशाच आदि हमारी हिंसा न करें. (४)
O gem! Protect me, my children and my wealth. The enemy should not encroach on us, that is, do not defeat us. Vampires who want to kill us should not do our violence. (4)

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
श॒प्तार॑मेतु श॒पथो॒ यः सु॒हार्त्तेन॑ नः स॒ह । चक्षु॑र्मन्त्रस्य दु॒र्हार्दः॑ पृ॒ष्टीरपि॑ शृणीमसि ॥ (५)
मुझे दिया हुआ शाप उसी के पास लौट जाए, जिस ने मुझे शाप दिया है. जो पुरुष शोभन हृदय वाला है, उस मित्र के साथ हम सुखी रहें. हम चुगली करने वाले दुष्ट हृदय वाले की आंखों एवं पसली की हड्डी को नष्ट करते हैं. (५)
Let the curse given to me return to the one who cursed me. May we be happy with a friend who is blessed with a man with a beautiful heart. We destroy the eyes and rib bone of the evil-hearted person who chews. (5)