अथर्ववेद (कांड 20)
कण्वा॑ इव॒ भृग॑वः॒ सूर्या॑ इव॒ विश्व॒मिद्धी॒तमा॑नशुः । इन्द्रं॒ स्तोमे॑भिर्म॒हय॑न्त आ॒यवः॑ प्रि॒यमे॑धासो अस्वरन् ॥ (२)
मनुष्य स्तोत्रों के द्वारा इंद्र को उसी प्रकार प्राप्त होते हैं, जिस प्रकार कण्व गोत्रीय ऋषि तीनों लोकों के स्वामी एवं फल की कामना करने वालों के द्वारा पूजित इंद्र को स्तुतियों के कारण प्राप्त हुए थे. जिस प्रकार सूर्य अपने नियंता इंद्र को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार भृगवंश के ऋषि इंद्र को प्राप्त होते हैं. (२)
Human beings receive Indra through stotras in the same way as the Kanva gotra rishi, the swami of the three worlds and worshiped by those who wish for the fruit, indra received due to praises. Just as the Sun attains its controller Indra, so does the sage Indra of the Bhriga dynasty. (2)