अथर्ववेद (कांड 20)
इ॒मं स्तोम॒मर्ह॑ते जा॒तवे॑दसे॒ रथ॑मिव॒ सं म॑हेमा मनी॒षया॑ । भ॒द्रा हि नः॒ प्रम॑तिरस्य सं॒सद्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥ (३)
रथकार जिस प्रकार रथ बनाता है, उसी प्रकार हम पूज्य अग्नि के लिए अपनी तीव्र बुद्धि से बनाए गए स्तोत्र से अग्नि देव की पूजा करते हैं. अग्नि के निवास स्थान अर्थात् यज्ञशालाओं में हमारी उत्तम बुद्धि कल्याणकारिणी हो. हे अग्नि देव! तुम्हारे बंधुभाव को प्राप्त कर के हम किसी के द्वारा पराजित न हों. (३)
Just as the charioteer makes a chariot, in the same way, we worship Agni Dev with a stotra made with our sharp intellect for the revered agni. Our best intellect should be Kalyankarini in the abode of agni i.e. yagyashalas. O God of Agni! We should not be defeated by anyone by attaining your brotherhood. (3)