हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.15.1

कांड 20 → सूक्त 15 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 15
प्र मंहि॑ष्ठाय बृह॒ते बृ॒हद्र॑ये स॒त्यशु॑ष्माय त॒वसे॑ म॒तिं भ॑रे । अ॒पामि॑व प्रव॒णे यस्य॑ दु॒र्धरं॒ राधो॑ वि॒श्वायु॒ शव॑से॒ अपा॑वृतम् ॥ (१)
मैं अतिशय महान, गुणों में बढ़े हुए, अत्यधिक धन वाले एवं सच्ची सामर्थ्य वाले इंद्र की स्तुति बल प्राप्त करने के लिए करता हूं. उन इंद्र का धन सभी मनुष्यों का पोषण करने में समर्थ है. जिस प्रकार जल नीचे की ओर जाता है, उसी प्रकार इंद्र का धन बल प्रदान करने के लिए प्रवृत्त होता है. (१)
I praise Indra, who is very great, elevated in qualities, with immense wealth and true power, to gain strength. The wealth of indra is capable of nurturing all human beings. Just as water moves downwards, so indra's wealth tends to provide strength. (1)