हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.15.6

कांड 20 → सूक्त 15 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 15
त्वं तमि॑न्द्र॒ पर्व॑तं म॒हामु॒रुं वज्रे॑ण वज्रिन्पर्व॒शश्च॑कर्तिथ । अवा॑सृजो॒ निवृ॑ताः॒ सर्त॒वा अ॒पः स॒त्रा विश्वं॑ दधिषे॒ केव॑लं॒ सहः॑ ॥ (६)
हे वज्रधारी इंद्र! तुम ने प्रसिद्ध, महान और विशाल पर्वतों के पंख आदि को अपने वज्र से काटा था. इस के बाद तुम ने पर्वत द्वारा रोके गए जलों को नदी के रूप में बहने के लिए छोड़ दिया था. केवल तुम ही इस प्रकार का असाधारण बल धारण करते हो. (६)
O Vajradhari Indra! You cut the wings of famous, great and huge mountains etc. with your thunderbolt. After this, you left the waters stopped by the mountain to flow as a river. Only you hold this kind of extraordinary force. (6)