हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.16.2

कांड 20 → सूक्त 16 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 16
सं गोभि॑रङ्गिर॒सो नक्ष॑माणो॒ भग॑ इ॒वेद॑र्य॒मणं॑ निनाय । जने॑ मि॒त्रो न दम्प॑ती अनक्ति॒ बृह॑स्पते वा॒जया॒शूँरि॑वा॒जौ ॥ (२)
महर्षि अंगिरस जिस प्रकार भगदेव के समान विवाह के समय पतिपत्नी को गोघृत आदि सहित अर्यमा देव की शरण प्राप्त कराते हैं, उसी प्रकार अंगिरस ऋषि इस पतिपत्नी को अर्यमा देव की शरण प्राप्त कराएं. सूर्य जिस प्रकार प्रकाश के निमित्त अपनी किरणों को एकत्र करते हैं, उसी प्रकार अंगिरस ऋषि इन पतिपत्नी को एकत्र करें. (२)
Just as Maharishi Angiras gives refuge to Aryama Dev with Goghrit etc. to the husband wife at the time of marriage like Bhagdev, in the same way, Angiras Rishi should get this husband wife the refuge of Aryama Dev. Just as the sun collects its rays for the sake of light, so the sage Angiras should collect these husbands and wives. (2)