हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.17.4

कांड 20 → सूक्त 17 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 17
वयो॒ न वृ॒क्षं सु॑पला॒शमास॑द॒न्त्सोमा॑स॒ इन्द्रं॑ म॒न्दिन॑श्चमू॒षदः॑ । प्रैषा॒मनी॑कं॒ शव॑सा॒ दवि॑द्युतद्वि॒दत्स्वर्मन॑वे॒ ज्योति॒रार्य॑म् ॥ (४)
जिस प्रकार पक्षी वृक्ष पर बैठते हैं, उसी प्रकार प्रसन्नता देने वाले सोम इंद्र का आश्रय लेते हैं. इन सोमों का मुख तेज से दीप्त होता है. इन्हीं सोमों ने मनुष्यों को प्रकाश प्राप्त करने के लिए सूर्य के रूप में ज्योति प्रदान की है. (४)
Just as birds sit on trees, so so do soma Indra, who gives happiness, takes shelter. The face of these somas is brightly lit. These Somas have given light to humans in the form of sun to get light. (4)