हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.17.6

कांड 20 → सूक्त 17 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 17
विशं॑विशं म॒घवा॒ पर्य॑शायत॒ जना॑नां॒ धेना॑ अव॒चाक॑श॒द्वृषा॑ । यस्याह॑ श॒क्रः सव॑नेषु॒ रण्य॑ति॒ स ती॒व्रैः सोमैः॑ सहते पृतन्य॒तः ॥ (६)
कामनाओं को पूर्ण करने वाले इंद्र अपने सभी उपासकों के पास एक साथ पहुंच जाते हैं तथा सब की स्तुतियां एक ही समय में सुन लेते हैं. इस प्रकार के इंद्र जिस यजमान के तीनों सपनों में प्रतिष्ठित होते हैं, वह अत्यधिक मादकता प्रदान करने वाले सोमों के प्रभाव से युद्ध के इच्छुक शत्रुओं को पराजित करता है. (६)
Indra, who fulfills the wishes, reaches all his worshipers together and hears everyone's praises at the same time. The host in whose three dreams this type of Indra is distinguished defeats the enemies who want to fight with the influence of the highly intoxicating Somas. (6)