हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.25.3

कांड 20 → सूक्त 25 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 25
अधि॒ द्वयो॑रदधा उ॒क्थ्यं वचो॑ य॒तस्रु॑चा मिथु॒ना या स॑प॒र्यतः॑ । असं॑यत्तो व्र॒ते ते॑ क्षेति॒ पुष्य॑ति भ॒द्रा श॒क्तिर्यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥ (३)
जो यज्ञ साधन पात्र रखे हैं, ऋत्विज्‌ उन पात्रों के द्वारा इंद्र आदि का पूजन करते हैं. उन पात्रों पर स्तुति के योग्य उक्थ स्थापित किया गया है. हे इंद्र! तुम्हारे निमित्त यज्ञ करने वाला यजमान संतान, पशु आदि से संपन्न हो तथा कल्याणमयी शक्ति को प्राप्त करे. (३)
The yajna instruments that are kept, the Ritvij worships Indra etc. through those characters. Praiseworthy of praise has been installed on those characters. O Indra! The host performing yajna for you should be endowed with children, animals etc. and get the welfare power. (3)