हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.30.1

कांड 20 → सूक्त 30 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
प्र ते॑ म॒हे वि॒दथे॑ शंसिषं॒ हरी॒ प्र ते॑ वन्वे व॒नुषो॑ हर्य॒तं मद॑म् । घृ॒तं न यो हरि॑भि॒श्चारु॒ सेच॑त॒ आ त्वा॑ विशन्तु॒ हरि॑वर्पसं॒ गिरः॑ ॥ (१)
हे इंद्र! तुम्हारे अश्व शीघ्रता से गमन करने वाले हैं. इस विशाल यज्ञ में मैं उन की प्रशंसा करता हूं. तुम शत्रुओं का वध करने वाले हो. सोमपान से उत्पन्न हुई शक्ति वाले इंद्र से मैं अपना अभीष्ट फल मांगता हूं. जैसे अग्नि में घृत सींचा जाता है, उसी प्रकार इंद्र अपने ही नाम के अश्वों सहित आते हुए धन की वर्षा करते हैं. (१)
Hey Indra! Your horses are going to move quickly. I praise him in this huge yagya. You are the slayer of the enemies. I ask for my desired result from Indra, who has the power generated from Sompan. Just as butter is poured into a fire, similarly Indra showers wealth by coming with his own named horses. (1)