अथर्ववेद (कांड 20)
नू इ॑न्द्र शूर॒ स्तव॑मान ऊ॒ती ब्रह्म॑जूतस्त॒न्वा वावृधस्व । उप॑ नो॒ वाजा॑न्मिमी॒ह्युप॒ स्तीन्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥ (११)
हे इंद्र! तुम हम से स्तुति और हवि प्राप्त करते हुए अधिक उन्नति करो तथा हमें धन और पुत्र प्रदान करो. हे अग्नि आदि देवताओ! तुम भी हमारा कल्याण करते हुए हमारे रक्षक बनो. (११)
O Indra! May you receive praise and love from us and make more progress and give us wealth and sons. O gods of agni! You also be our protector while doing our welfare. (11)