हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 40
इन्द्रे॑ण॒ सं हि दृक्ष॑से संजग्मा॒नो अबि॑भ्यु॒षा । म॒न्दू स॑मा॒नव॑र्चसा ॥ (१)
हे इंद्र! तुम मरुतों के साथ रहते हो और अपने उपासकों को अभय प्रदान करते हो. मरुतों के साथ रहते हुए तुम प्रसन्न होते हो. मरुतों का और तुम्हारा तेज समान है. (१)
O Indra! You live with the Maruts and give abhaya to your worshippers. You are happy to be with the Maruts. The glory of the maruts and yours are the same. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 40
अ॑नव॒द्यैर॒भिद्यु॑भिर्म॒खः सह॑स्वदर्चति । ग॒णैरिन्द्र॑स्य॒ काम्यैः॑ ॥ (२)
यह यज्ञ इंद्र की कामना करने वालों से अत्यधिक सुशोभित हो रहा है. इंद्र अत्यधिक तेजस्वी और निष्पाप अर्थात्‌ पाप रहित हैं. (२)
This yajna is being highly adorned by those who wish for Indra. Indra is very bright and innocent i.e. without sin. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 40
आदह॑ स्व॒धामनु॒ पुन॑र्गर्भ॒त्वमे॑रि॒रे । दधा॑ना॒ नाम॑ य॒ज्ञिय॑म् ॥ (३)
हवि स्वीकार कर के इंद्र शक्तिशाली बनते हैं और याज्ञिक नाम प्राप्त करते हैं. (३)
By accepting Havi, Indra becomes powerful and gets a yagnik name. (3)