हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 41
इन्द्रो॑ दधी॒चो अ॒स्थभि॑र्वृ॒त्राण्यप्र॑तिष्कुतः । ज॒घान॑ नव॒तीर्नव॑ ॥ (१)
इंद्र कभी भी युद्ध से पीछे नहीं हटते हैं. उन्होंने ही वृत्र असुर के निन्यानवे वृत्रों राक्षसो का विनाश किया था. (१)
Indra never backs out of war. It was he who destroyed ninety-nine Vritra rakshasas of Vritra Asura. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 41
इ॒च्छनश्व॑स्य॒ यच्छिरः॒ पर्व॑ते॒ष्वप॑श्रितम् । तद्वि॑दच्छर्य॒णाव॑ति ॥ (२)
पर्वतों में छिपे हुए अपने घोड़े का सिर प्राप्त करने के इच्छुक इंद्र ने शर्यणावत में प्राप्त किया था, तब उस का वज्र बना कर उन्होंने असुरों का वध किया था. (२)
Indra, who wanted to get the head of his horse hidden in the mountains, had received it in Sharyanavat, then he killed the asuras by making a thunderbolt of it. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 41
अत्राह॒ गोर॑मन्वत॒ नाम॒ त्वष्टु॑रपी॒च्यम् । इ॒त्था च॒न्द्रम॑सो गृ॒हे ॥ (३)
चंद्र मंडल एक ग्रह है. उस में सूर्य रूपी इंद्र ही अपनी एक किरण में विराजते हैं. (३)
The lunar system is a planet. In that, Indra, the form of the sun, sits in one of his rays. (3)