हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 42
वाच॑म॒ष्टाप॑दीम॒हं नव॑स्रक्तिमृत॒स्पृश॑म् । इन्द्रा॒त्परि॑ त॒न्वं ममे ॥ (१)
मैं ने इस वाणी को इंद्र से अपने शरीर में धारण किया है जो सत्य का स्पर्श करने वाली है. उस वाणी के आठ चरण और नौ शीर्ष हैं. (१)
I have held this voice in my body from Indra, which is going to touch the truth. That speech has eight stages and nine headings. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 42
अनु॑ त्वा॒ रोद॑सी उ॒भे क्रक्ष॑माणमकृपेताम् । इन्द्र॒ यद्द॑स्यु॒हाभ॑वः ॥ (२)
हे इंद्र! जब तुम ने असुरों का विनाश किया था, तब तुम्हारी शक्ति को देख कर द्यावा अर्थात्‌ स्वर्ग और पृथ्वी ने तुम पर कृपा की थी. (२)
O Indra! When you destroyed the asuras, seeing your power, Dyava i.e. heaven and earth were kind to you. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 42
उ॑त्तिष्ठ॒न्नोज॑सा स॒ह पी॒त्वी शिप्रे॑ अवेपयः । सोम॑मिन्द्र च॒मू सु॒तम् ॥ (३)
हे इंद्र! भलीभांति तैयार किए गए सोमरस को पी कर तुम अपनी ठोड़ी चलाते हुए उठो. (३)
O Indra! Drink the well-crafted somers and get up running your chin. (3)