हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 45
अ॒यमु॑ ते॒ सम॑तसि क॒पोत॑ इव गर्भ॒धिम् । वच॒स्तच्चि॑न्न ओहसे ॥ (१)
हे इंद्र! कबूतर जिस प्रकार गर्भ धारण करने वाली कबूतरी के समीप जाता है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को सुन कर हमारे पास आओ. (१)
O Indra! Just as a pigeon goes near the pigeon that conceives, so you listen to our praises and come to us. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 45
स्तो॒त्रं रा॑धानां पते॒ गिर्वा॑हो वीर॒ यस्य॑ ते । विभू॑तिरस्तु सू॒नृता॑ ॥ (२)
हे धन के स्वामी इंद्र! तुम्हारा यह नाम सत्य हो. हमारी स्तुतियां तुम्हें हमारे पास लाने में समर्थ हैं. (२)
O Swami of Wealth Indra! Your name is true. Our praises are able to bring you to us. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 45
ऊ॒र्ध्वस्ति॑ष्ठा न ऊ॒तये॒ऽस्मिन्वाजे॑ शतक्रतो । सम॒न्येषु॑ ब्रवावहै ॥ (३)
हे सैकड़ों कर्म करने वाले इंद्र! तुम हमारी रक्षा करने के लिए ऊंचे स्थान पर खड़े हो जाओ. अन्य पुरुष हम से द्वेष करते हैं. हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (३)
O Indra, who does hundreds of deeds! You stand in a high place to protect us. Other men hate us. We praise you. (3)