हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.5.4

कांड 20 → सूक्त 5 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
दी॒र्घस्ते॑ अस्त्वङ्कु॒शो येना॒ वसु॑ प्र॒यच्छ॑सि । यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥ (४)
हे इंद्र! अंकुश के समान झुकी हुई उंगलियों वाला तुम्हारा हाथ विशाल है. उस हाथ से तुम सोम निचोड़ने वाले यजमान को धन देते हो. (४)
O Indra! Your hand with bent fingers like a curb is huge. With that hand, you give money to the host who squeezes soma. (4)