हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.50.2

कांड 20 → सूक्त 50 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 50
कदु॑ स्तु॒वन्त॑ ऋतयन्त दे॒वत॒ ऋषिः॒ को विप्र॑ ओहते । क॒दा हवं॑ मघवन्निन्द्र सुन्व॒तः कदु॑ स्तुव॒त आ ग॑मः ॥ (२)
हे इंद्र! कौन सा ऋषि तुम्हारे संबंध में तर्क करता है? किस कारण तुम सोमरस वाले स्तोता के बुलाने पर ही आते हो? सत्य की इच्छा करने वाले देवों का समूह किस कारण तुम्हारी स्तुति करता है? (२)
O Indra! Which sage argues about you? Why do you come only when the psalm of Someras is called? Why does the group of gods who desire the truth praise you? (2)