अथर्ववेद (कांड 20)
ए॒वा ह्य॑स्य सू॒नृता॑ विर॒प्शी गोम॑ती म॒ही । प॒क्वा शाखा॒ न दा॒शुषे॑ ॥ (४)
इंद्र को गौ प्रदान करने वाली धरती हवि देने वाले यजमान के लिए उस वृक्ष की शाखा के समान हो जाती है, जिस पर पके हुए फल लगे होते हैं. (४)
The earth that provides cow to Indra becomes like a branch of a tree on which ripe fruits are planted for the host who gives havi. (4)