अथर्ववेद (कांड 20)
विश्वे॑षु॒ हि त्वा॒ सव॑नेषु तु॒ञ्जते॑ समा॒नमेकं॒ वृष॑मण्यवः॒ पृथ॒क्स्व: सनि॒ष्यवः॒ पृथ॑क् । तं त्वा॒ नावं॒ न प॒र्षणिं॑ शू॒षस्य॑ धु॒रि धी॑महि । इन्द्रं॒ न य॒ज्ञैश्च॒तय॑न्त आ॒यव॒ स्तोमे॑भिरिन्द्रमा॒यवः॑ ॥ (१)
हे इंद्र! फलों की वर्षा की याचना करने वाले, भांतिभांति के स्वर्गो की कामना करने वाले तथा प्रातः, मध्याह्न और सायं सवनों में तुम्हारी ही प्रार्थना करते हैं. जिस प्रकार नौका अन्न के पूलों से भरी होती है, उसी प्रकार हम बल धारण के लिए नियुक्त करते हैं. हम इंद्र को प्रसन्न करने की इच्छा से अपने स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं. (१)
O Indra! Those who plead for the rain of fruits, those who wish for heavens of kindness and pray to you in the morning, midday and evening evening. Just as a boat is full of pools of food, so we appoint for force. We recite our stotras with the desire to please Indra. (1)