अथर्ववेद (कांड 20)
यच्चि॒द्धि स॑त्य सोमपा अनाश॒स्ता इ॑व॒ स्मसि॑ । आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥ (१)
हे सोमरस का पान करने वाले इंद्र! हमारे हजारों की संख्या वाले घोड़े, गायों और शुभ्रियों के अमृत होने की बात कहो; क्योंकि तुम अमृतत्व को प्राप्त कर चुके हो. (१)
O Indra, who drinks Someras! Speak of the nectar of our horses, cows and whites of thousands; Because you have attained nectar. (1)