हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.76.1

कांड 20 → सूक्त 76 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 76
वने॒ न वा॒ यो न्य॑धायि चा॒कं छुचि॑र्वां॒ स्तोमो॑ भुरणावजीगः । यस्येदिन्द्रः॑ पुरु॒दिने॑षु॒ होता॑ नृ॒णां नर्यो॑ नृत॑मः क्ष॒पावा॑न् ॥ (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम देवताओं का भरणपोषण करने वाले हो. यह निर्दोष तथा इंद्र की कामना करने वाला स्तोत्र हैं. इंद्र इस की कामना बहुत दिनों से करते हैं. वे इंद्र मनुष्यों के श्रेष्ठ सोमरस को प्राप्त करने वाले हैं. यह स्तोत्र अर्थात्‌ मंत्र समूह उन्हीं की ओर अग्रसर होता है. (१)
O Ashwinikumaro! You are the one who sustains the gods. It is a hymn that is innocent and wishes for Indra. Indra wishes for this for a long time. He is the one who receives Indra, the best Someras of human beings. This stotra i.e. mantra group leads to them. (1)