अथर्ववेद (कांड 20)
आ मध्वो॑ अस्मा असिच॒न्नम॑त्र॒मिन्द्रा॑य पू॒र्णं स हि स॒त्यरा॑धाः । स वा॑वृधे॒ वरि॑म॒न्ना पृ॑थि॒व्या अ॒भि क्रत्वा॒ नर्यः॒ पौंस्यै॑श्च ॥ (७)
इंद्र के लिए यह पात्र मधुर रस से पूर्ण किया गया है. वे इंद्र अपने बल से ही पृथ्वी पर प्रबुद्ध होते हैं तथा सत्य के द्वारा उन्हीं की पूजा होती है. (७)
For Indra, this character is completed with sweet juice. That Indra is enlightened on earth only by his force and he is worshiped by truth. (7)