हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.77.8

कांड 20 → सूक्त 77 → मंत्र 8 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 77
अ॒पो यदद्रिं॑ पुरुहूत॒ दर्द॑रा॒विर्भु॑वत्स॒रमा॑ पू॒र्व्यं ते॑ । स नो॑ ने॒ता वाज॒मा द॑र्षि॒ भूरिं॑ गो॒त्रा रु॒जन्नङ्गि॑रोभिर्गृणा॒नः ॥ (८)
हे इंद्र! तुम अनेक यजमानों के द्वारा बुलाए जा चुके हो. तुम जिस जल को हमें प्रदान करते हो, वह जल तुरंत प्रकट हो कर बहने लगता है. तुम अंगिरसों द्वारा स्तुति किए गए मेघों को चीरते हुए हमें अपरिमित अन्न प्रदान करते हो. (८)
O Indra! You have been called by many hosts. The water that you provide us, that water immediately appears and starts flowing. You rip apart the clouds praised by the Angiras and give us infinite food. (8)