हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 85
मा चि॑द॒न्यद्वि शं॑सत॒ सखा॑यो॒ मा रि॑षण्यत । इन्द्र॒मित्स्तो॑ता॒ वृष॑णं॒ सचा॑ सु॒ते मुहु॑रु॒क्था च॑ शंसत ॥ (१)
हे स्तोताओ! तुम अन्य किसी देवता का आश्रय मत लो. तुम किसी अन्य देवता की स्तुति मत करो. हे तैयार किए गए सोमरस वाले होताओ! तुम इंद्र की स्तुति करते हुए बारबार उवथों का गान करो. (१)
O stotao! Don't take shelter from any other god. Don't praise any other god. O be the ones with the prepared somers! Praise Indra and sing the obstinates again and again. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 85
अ॑वक्र॒क्षिणं॑ वृष॒भं य॑था॒जुरं॒ गां न च॑र्षणी॒सह॑म् । वि॒द्वेष॑णं सं॒वन॑नोऽभयंक॒रं मंहि॑ष्ठमुभया॒विन॑म् ॥ (२)
इंद्र सांड के समान घूमने वाले, संघर्षशील, अवकक्षी, शत्रुओं के द्वेषी, अजर, अतिशय महिमाशाली, सेवा के योग्य तथा दोनों लोकों के रक्षक हैं. (२)
Indra is a bull-like wanderer, struggling, avakshi, hostile to enemies, ajar, very glorious, worthy of service and protector of both worlds. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 85
यच्चि॒द्धि त्वा॒ जना॑ इ॒मे नाना॒ हव॑न्त ऊ॒तये॑ । अ॒स्माकं॒ ब्रह्मे॒दमि॑न्द्र भूतु॒ तेऽहा॒ विश्वा॑ च॒ वर्ध॑नम् ॥ (३)
हे इंद्र! तुम्हारा संरक्षण पाने के लिए बहुत से पुरुष तुम्हें बुलाते हैं. हमारा यह स्तोत्र भी तुम्हारी वृद्धि करने वाला है. (३)
O Indra! Many men call you to get your protection. This hymn of ours is also going to increase you. (3)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 85
वि त॑र्तूर्यन्ते मघवन्विप॒श्चितो॒ऽर्यो विपो॒ जना॑नाम् । उप॑ क्रमस्व पुरु॒रूप॒मा भ॑र॒ वाजं॒ नेदि॑ष्ठमू॒तये॑ ॥ (४)
हे इंद्र! तुम यहां शीघ्र आ कर विशाल रूप धारण करो. इन विद्वान्‌ मनुष्यों और यजमानों की उंगलियां शीघ्रताकारी हैं. तुम हमारे पालन के लिए अन्न हमारे समीप लाओ तथा हमें प्रदान करो. (४)
O Indra! You come here soon and take a huge form. The fingers of these learned human beings and hosts are quick. Bring food near to us for our upbringing and give it to us. (4)