अथर्ववेद (कांड 20)
येना॑ समु॒द्रमसृ॑जो म॒हीर॒पस्तदि॑न्द्र॒ वृष्णि॑ ते॒ शवः॑ । स॒द्यः सो अ॑स्य महि॒मा न सं॒नशे॒ यं क्षो॒णीर॑नुचक्र॒दे ॥ (४)
हे इंद्र! जिस बल से तुम ने सागर को भरने वाले प्रभूत जलों का निर्माण किया था, तुम्हारा वह बल सब को अभीष्ट फल देता है. हम भूलोकवासी तुम्हारी जिस महिमा का गान करते हैं, उसे दूसरे अर्थात् शत्रु भलीभांति नहीं जान सकते. (४)
O Indra! The force with which you created the great waters that fill the ocean, that force of yours gives everyone the desired fruit. The glory that we forgetful people sing to you cannot be well known by others, that is, enemies. (4)