हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.93.4

कांड 20 → सूक्त 93 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 93
ई॒ङ्खय॑न्तीरप॒स्युव॒ इन्द्रं॑ जा॒तमुपा॑सते । भे॑जा॒नासः॑ सु॒वीर्य॑म् ॥ (४)
जल की कामना करती हुई तथा श्रेष्ठ वीर्य से भरी हुई ओषधियां उत्पन्न होते ही इंद्र की इच्छा करती हैं. (४)
The medicines, which are wishing for water and filled with superior semen, desire Indra as soon as they are born. (4)