हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.97.3

कांड 20 → सूक्त 97 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 97
कदू॒ न्वस्याकृ॑त॒मिन्द्र॑स्यास्ति॒ पौंस्य॑म् । केनो॒ नु कं॒ श्रोम॑तेन॒ न शु॑श्रुवे ज॒नुषः॒ परि॑ वृत्र॒हा ॥ (३)
यह किस ने नहीं सुना है कि इंद्र ने वृत्र राक्षस का नाश किया. ऐसा कोई पराक्रम नहीं है, जो इंद्र में न हो. (३)
Who has not heard that Indra destroyed the vritra demon. There is no power that Indra does not have. (3)