हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
उ॒त दे॑वा॒ अव॑हितं॒ देवा॒ उन्न॑यथा॒ पुनः॑ । उ॒ताग॑श्च॒क्रुषं॑ देवा॒ देवा॑ जी॒वय॑था॒ पुनः॑ ॥ (१)
हे देवो! यज्ञोपवीत संस्कार वाले इस बालक को धर्म पालन के विषय में सावधान करो. इसे अध्ययन से उत्पन्न ज्ञान आदि फल प्राप्त कराओ. हे देवो! इस ने अनुष्ठान न करने के रूप में जो पाप किया है, उस से इस की रक्षा करो. तुम इसे सौ वर्ष तक जीवित रखो. (१)
O Devas! Inform this child about the practice of dharma with yajnopavit sanskar. Give him the knowledge generated from studying. O Devas! Protect him from the misdeed in the form of not performing rituals. You keep the child alive for a hundred years. (1)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
द्वावि॒मौ वातौ॑ वात॒ आ सिन्धो॒रा प॑रा॒वतः॑ । दक्षं॑ ते अ॒न्य आ॒वातु॒ व्य॒न्यो वा॑तु॒ यद्रपः॑ ॥ (२)
सागर और उस से भी दूर देश से आने वाली दोनों प्रकार की हवाएं चलें. प्राण और अपान वायु इस के शरीर में गति करें. हे उपनयन संस्कार वाले पुरुष! प्राण वायु तुझे बल प्रदान करे तथा अपान वायु तेरे पापों को दूर करे. (२)
Both types of winds coming from the sea and the country away from it should run. Prana and apana vayu move in his body. O men with upanayana rites! May the air of life give you strength and may your air remove your sins. (2)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
आ वा॑त वाहि भेष॒जं वि वा॑त वाहि॒ यद्रपः॑ । त्वं हि वि॑श्वभेषज दे॒वानां॑ दू॒त ईय॑से ॥ (३)
हे वायु! सभी रोगों का विनाश करने वाली जड़ीबूटी लाओ तथा रोग उत्पन्न करने वाले पाप का विनाश करो. हे वायु! तुम सभी व्याधियों को दूर करने वाली हो, इसीलिए तुम्हें इंद्र आदि देवों का दूत कहा जाता है. (३)
O wind! Bring herbs that destroy all diseases and destroy the sin that causes disease. O wind! You are the remover of all diseases, that is why you are called the messenger of Indra etc. gods. (3)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
त्राय॑न्तामि॒मं दे॒वास्त्राय॑न्तां म॒रुतां॑ ग॒णाः । त्राय॑न्तां॒ विश्वा॑ भू॒तानि॒ यथा॒यम॑र॒पा अस॑त् ॥ (४)
इंद्र आदि देव इस उपनयन संस्कार वाले ब्रह्मचारी की रक्षा करें. उनचास मरुत्‌ इस की रक्षा करें. सभी प्राणी इस की इस प्रकार रक्षा करें, जिस से यह पाप रहित हो सके. (४)
May Indra Adi Dev protect this brahmachari with upanayana sanskar. Protect it forty-nine. All beings should protect it in such a way that it can be free from sin. (4)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
आ त्वा॑गमं॒ शंता॑तिभि॒रथो॑ अरि॒ष्टता॑तिभिः । दक्षं॑ त उ॒ग्रमाभा॑रिषं॒ परा॒ यक्ष्मं॑ सुवामि ते ॥ (५)
हे उपनयन संस्कार वाले ब्रह्मचारी! मैं सुख देने वाले मंत्रों और कल्याणकारी कर्मो के साथ तेरे पास आया हूं. मैं तेरे लिए उग्र एवं समृद्धि देने वाला बल लाया हूं. मैं यक्ष्मा रोग को तुझ से दूर भगाता हूं. (५)
O Brahmachari with upanayana sanskar! I have come to you with happy mantras and welfare deeds. I have brought you a fierce and prosperous force. I drive tuberculosis away from you. (5)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
अ॒यं मे॒ हस्तो॒ भग॑वान॒यं मे॒ भग॑वत्तरः । अ॒यं मे॑ वि॒श्वभे॑षजो॒ऽयं शि॒वाभि॑मर्शनः ॥ (६)
मुझ ऋषि का यह हाथ भाग्य वाला एवं भाग्यवालियों से भी अधिक उत्तम है. मेरा यह हाथ सभी रोगों को दूर करने वाली ओषधि है. इस का स्पर्श सुख देने वाला हो. (६)
This hand of my sage is lucky and better than the lucky ones. This hand of mine is a medicine to remove all diseases. The touch of this is pleasant. (6)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
हस्ता॑भ्यां॒ दश॑शाखाभ्यां जि॒ह्वा वा॒चः पु॑रोग॒वी । अ॑नामयि॒त्नुभ्यां॒ हस्ता॑भ्यां॒ ताभ्यां॑ त्वा॒भि मृ॑शामसि ॥ (७)
हे उपनयन संस्कार वाले बालक! प्रजापति के दस उंगलियों वाले हाथों के द्वारा निर्मित जीभ शब्दों के आगेआगे चलती है. सरस्वती का उस में अधिष्ठान है. प्रजापति के उन्हीं रोगनाशक हाथों से मैं तेरा स्पर्श करता हूं. (७)
O children with upanayana rites! The tongue formed by Prajapati's ten-fingered hands moves ahead of the words. Saraswati has a adhishthan in it. I touch you with the same curative hands of Prajapati. (7)