हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 4.14.6

कांड 4 → सूक्त 14 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 14
अ॒जम॑नज्मि॒ पय॑सा घृ॒तेन॑ दि॒व्यं सु॑प॒र्णं प॑य॒सं बृ॒हन्त॑म् । तेन॑ गेष्म सुकृ॒तस्य॑ लो॒कं स्व॑रा॒रोह॑न्तो अ॒भि नाक॑मुत्त॒मम् ॥ (६)
द्युलोक के योग्य एवं यजमान को स्वर्ग में पहुंचाने वाले बकरे को मैं रसयुक्त घी से चुपड़ता हूं. इस प्रकार के बकरे की सहायता से पुण्य के फल के रूप में मिलने वाले स्वर्गलोक को जाएं तथा दुःख के स्पर्श से शून्य हो कर उत्तम सूर्य ज्योति को प्राप्त करें. (६)
I rub the goat worthy of the temple and the one who takes the host to heaven with juice-rich ghee. With the help of this type of goat, go to heaven, which is the fruit of virtue, and get rid of the touch of sorrow and get the best sunlight. (6)