अथर्ववेद (कांड 4)
द॒र्शय॑ मा यातु॒धाना॑न्द॒र्शय॑ यातुधा॒न्यः॑ । पि॑शा॒चान्त्सर्वा॑न्दर्श॒येति॒ त्वा र॑भ ओषधे ॥ (६)
हे सदापुष्पा जड़ी! मुझे राक्षसों एवं राक्षसियों के दर्शन कराओ. वे गूढ़ रूप से मुझे बाधा न पहुंचा सकें. मैं तुम्हें इसीलिए धारण करता हूं कि तुम मुझे सभी पिशाचों को दिखाओ. (६)
O Sadapushpa Jadi! Make me see demons and demons. They can't esoterically obstruct me. I hold you so that you show me to all vampires. (6)