हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 4.22.5

कांड 4 → सूक्त 22 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 22
यु॒नज्मि॑ त उत्त॒राव॑न्त॒मिन्द्रं॒ येन॒ जय॑न्ति॒ न प॑रा॒जय॑न्ते । यस्त्वा॒ कर॑देकवृ॒षं जना॑नामु॒त राज्ञा॑मुत्त॒मं मा॑न॒वाना॑म् ॥ (५)
हे राजन्‌! मैं अतिशय उत्कर्ष वाले इंद्र को तुम्हारा मित्र बनाता हूं. उन इंद्र की प्रेरणा से तुम्हारे योद्धा विजयी होंगे, कभी पराजित नहीं होंगे. जिस दंद् ने तुम्हें अन्य मनुष्यों के मध्य गायों में सांड़ के समान उत्तम बनाया है, उसी ने तुम्हें मनुष्यों और राजाओं में श्रेष्ठ बनाया है. (५)
O king! I make indra of great excellence your friend. With the inspiration of that Indra, your warriors will be victorious, never defeated. The demon who has made you as good as a bull among other men among cows has made you superior among men and kings. (5)